यूपी के 36 हजार रोजगार सेवकों का आर-पार का मूड: नियमितीकरण और 24 हजार मानदेय के लिए 1 जुलाई को लखनऊ में महाप्रदर्शन
आजमगढ़/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अपनी विभिन्न मांगों को लेकर ग्राम रोजगार सेवकों का आक्रोश गहराता जा रहा है। प्रदेश के 36 हजार से अधिक ग्राम रोजगार सेवकों ने अब सीधे सरकार से टक्कर लेने का मन बना लिया है। 10 सूत्रीय मांगों के समर्थन में मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपने के बाद, उन्होंने 1 जुलाई 2026 को लखनऊ में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
क्या हैं प्रमुख मांगें?
रोजगार सेवकों का कहना है कि वे वर्ष 2006 से मनरेगा योजना के तहत ग्राम पंचायतों में सेवा दे रहे हैं, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी वे संविदा की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
राज्य कर्मचारी का दर्जा: संविदा समाप्त कर उन्हें नियमित किया जाए और सहायक सचिव या ग्राम विकास सहायक के पद पर समायोजित किया जाए।
वेतन वृद्धि: मानदेय बढ़ाकर न्यूनतम 24,000 रुपये प्रति माह किया जाए।
सुविधाएं: ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा, आकस्मिक व चिकित्सा अवकाश और मृतक आश्रितों को सेवा में समायोजन।
जॉब चार्ट में बदलाव: मनरेगा के अतिरिक्त अन्य विभागीय कार्यों को भी जॉब चार्ट में शामिल किया जाए।
1 जुलाई को लखनऊ में होगा 'विधानसभा घेराव'
रोजगार सेवकों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे 1 जुलाई 2026 को राजधानी लखनऊ में भारी संख्या में जुटेंगे। इस दौरान वे विधानसभा घेराव के साथ-साथ जवाहर भवन, इंदिरा भवन, भाजपा कार्यालय, चारबाग रेलवे स्टेशन और राजभवन के गेट पर धरना-प्रदर्शन करेंगे।
'समान काम, समान वेतन' की मांग
ज्ञापन में रोजगार सेवकों ने तर्क दिया है कि देश के कई अन्य राज्यों में समान पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को 'समूह-ग' के बराबर वेतन और अन्य सुविधाएं मिल रही हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में उन्हें मात्र 10,000 रुपये के मानदेय पर काम करना पड़ रहा है, जो महंगाई के इस दौर में बेहद अपर्याप्त है।
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार 1 जुलाई के अल्टीमेटम से पहले रोजगार सेवकों की समस्याओं का समाधान निकालती है या प्रदेश की राजधानी एक बड़े जन-आंदोलन का साक्षी बनेगी।