हरित तनों से हरित उद्यमों तक: बांस बन रहा ग्रामीण आजीविका, नवाचार और नए अवसरों का सशक्त माध्यम
नई दिल्ली:
शिल्प से लेकर आधुनिक राष्ट्रीय नीतियों तक, बांस अब भारत में ग्रामीण आजीविका, उद्यमिता और सतत विकास का एक मजबूत प्रतीक बन चुका है। गुरुग्राम में आयोजित 'सरस आजीविका मेला' हो या पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्य, बांस आज लाखों लोगों के जीवन में आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोल रहा है।
नीतिगत बदलावों ने खोली राह
किए गए ऐतिहासिक सुधारों के तहत सरकार ने ब्रिटिश काल के उस पुराने कानून को बदला, जिसके तहत बांस को 'पेड़' के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इस वर्गीकरण के हटने और प्रतिबंधात्मक वन नियमों से मुक्ति मिलने के बाद बांस की कटाई, परिवहन और इसके व्यावसायिक उपयोग से जुड़ी अड़चनें दूर हो गईं। इस दूरदर्शी कदम ने देश भर में, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों में बांस आधारित उद्योगों और नवाचार को नई गति दी है।
देशभर में सफलता की अनूठी कहानियां
असम और सिक्किम: असम की विशाखा दीदी ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर बांस शिल्प को नए आयाम दिए और 2025 के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में अपने उत्पादों से शानदार कमाई की। वहीं सिक्किम में चिमी ओंगमु भूटिया का 'लगस्टल डिजाइन स्टूडियो' बांस के हस्तशिल्प और फर्नीचर निर्माण के जरिए सतत विकास की मिसाल पेश कर रहा है।
मध्य प्रदेश में खेती को बढ़ावा: राष्ट्रीय बांस मिशन के सहयोग से मध्य प्रदेश के किसानों ने बांस की खेती को अपनाया है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी के साथ-साथ अंतर्फसल (मर्च, अदरक आदि) उगाने का भी लाभ मिल रहा है।
महाराष्ट्र की गढ़चिरोली अगरबत्ती परियोजना: यहाँ महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बांस आधारित अगरबत्ती उत्पादन ने हजारों महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है। इनमें करीब 90 प्रतिशत श्रमिक महिलाएं हैं, जिनकी आय और कार्य दिवसों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
इंजीनियर्ड बांस और आधुनिक तकनीक
राष्ट्रीय बांस मिशन और एनईसीटीएआर (NECTAR) जैसी संस्थाओं के प्रयासों से बांस उत्पादों के मूल्यवर्धन (Value Addition) में भारी वृद्धि हुई है। आज 'इंजीनियर्ड बांस' का उपयोग आपदा राहत संरचनाओं, भवनों और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में स्कूल कक्षों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
हाल ही में सीएसआईआर-एनईआरआई (Nagpur) द्वारा महिलाओं के लिए बांस हस्तशिल्प पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिससे फ्लाई ऐश डंप जैसे क्षेत्रों को उत्पादक परिदृश्यों में बदलकर पर्यावरण और रोजगार दोनों को बढ़ावा मिल रहा है। पारंपरिक संसाधन को प्रौद्योगिकी और उद्यम से जोड़कर बांस आज भारत के ग्रामीण विकास की एक नई इबारत लिख रहा है।