उत्तराखंड की देशी 'बद्री' नस्ल के संरक्षण में ऐतिहासिक उपलब्धि: ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से साहीवाल गाय ने दिया बद्री बछिया को जन्म
पंतनगर / नई दिल्ली:
देश की देशी मवेशी नस्लों के संरक्षण, उनकी संख्या में वृद्धि और आनुवंशिक सुधार (Genetic Improvement) की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नया इतिहास रच दिया है। एकेडमिक डेयरी फार्म में एडवांस 'ओवम पिक-अप और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन' (OPU-IVF) तकनीक का सफल प्रयोग करते हुए एक स्वस्थ बद्री नस्ल की बछिया का जन्म हुआ है। इस प्रयोग की सबसे खास बात यह रही कि बद्री नस्ल के तैयार भ्रूण को साहीवाल नस्ल की गाय में प्रत्यारोपित (Embryo Transfer) किया गया था, जिसने 11 सितंबर 2026 को इस बछिया को जन्म दिया।
उल्लेखनीय है कि बद्री मवेशी उत्तराखंड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण देशी आनुवंशिक संसाधन हैं और इन्हें उत्तराखंड के 'राज्य पशु' का दर्जा प्राप्त है।
दो प्रमुख संस्थानों का साझा प्रयास
यरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-NDRI) और पंतनगर स्थित जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बीच हुए वैज्ञानिक सहयोग का परिणाम है। इस अनुसंधान परियोजना को उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद (हल्दी) द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।
इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आईसीएआर-एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि ओपीयू-आईवीएफ जैसी आधुनिक प्रजनन तकनीकें उच्च गुणवत्ता वाले मादा जर्मप्लाज्म का तेजी से प्रसार करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि यह सफल जन्म उत्तराखंड की इस अनमोल देशी नस्ल के संरक्षण और संवर्धन के लिए तकनीक-आधारित आधुनिक ढांचे की नींव रखेगा।
2023 में रखी गई थी अनुसंधान की नींव
इस अनुसंधान कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2023 में जी. बी. पंत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम. एस. चौहान के मार्गदर्शन में हुई थी। पिछले तीन वर्षों के दौरान दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने बद्री गायों के लिए ओवम पिक-अप, लैब में भ्रूण उत्पादन और उसके सफल प्रत्यारोपण की जटिल प्रक्रियाओं को विकसित किया।
ऐसे पूरा हुआ ओपीयू-आईवीएफ (OPU-IVF) का चक्र
अंडों का संकलन: अल्ट्रासाउंड-निर्देशित 'ओवम पिक-अप' (OPU) विधि से उच्च आनुवंशिक गुण वाली बद्री गायों से अंडे (ओसाइट्स) एकत्रित किए गए।
इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन: प्रयोगशाला में परिपक्व किए गए अंडों को उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले बद्री सांड के वीर्य से फर्टिलाइज कराया गया।
भ्रूण प्रत्यारोपण: प्रयोगशाला में तैयार किए गए भ्रूणों को संकरित प्राप्तकर्ता (रिसीपिएंट) गायों में रोपित किया गया। ऐसे ही एक भ्रूण से साहीवाल गाय के जरिए स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म हुआ।
वैज्ञानिकों के अनुसार, एक अन्य प्राप्तकर्ता गाय भी पूरी तरह स्वस्थ है और अगले 5 से 7 दिनों में एक और बद्री बछड़े के जन्म की उम्मीद है।
अगला लक्ष्य: बद्री गायों की क्लोनिंग
यह तकनीक पारंपरिक प्रजनन तरीकों की तुलना में श्रेष्ठ जर्मप्लाज्म के गुणन की गति को कई गुना बढ़ा देगी। इसके साथ ही, वैज्ञानिक टीम अधिक दूध देने वाली बद्री गायों की क्लोनिंग (Cloning) पर भी काम कर रही है। अनुसंधान के विभिन्न चरणों के तहत क्लोन किए गए बद्री भ्रूण सफलतापूर्वक तैयार कर लिए गए हैं, जिन्हें जल्द ही प्राप्तकर्ता गायों में प्रत्यारोपित किया जाएगा।
यह तकनीक न केवल उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में पशुधन के सतत विकास को गति देगी, बल्कि भारत की देशी नस्लों के दीर्घकालिक संरक्षण में भी मील का पत्थर साबित होगी।